पुरस्कारों में भ्रष्टाचार केंद्र हो या राज्य सरकार

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फर्क इंडिया दिसंबर 2016 अंक

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पुरस्कारों में भी यदि सियासत और कारोबार की बू आने लगे, तो यह समझ लेना चाहिए कि यह इन पुरस्कारों की गरिमा के खिलाफ है। हालांकि अब ऐसा ही कारोबार जोर पकड़ने लगा है। उत्तर प्रदेश में दिए जाने वाले यश भारती पुरस्कार से लेकर देश के सबसे बड़े पुरस्कार भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला रहा है। पुरस्कारों का इस तरह से मिसयूज होने लगा है कि इससे लोकतंत्र के चौथे खंभे को भी प्रभावित करने की पूरी कोशिश की जा रही है। पत्रकारों को यश भारती से लेकर छोटे मोटे पुरस्कार देकर उन्हें उपकृत किया जा रहा है।

इन सभी के बीच सबसे चौकाने वाली बात यह है कि ऐसा सामाजिक न्याय और आम जनता की भलाई के लिए लड़ने का दावा करने वाली सरकारें कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में कई पत्रकारों को पुरस्कार देकर उनके मुंह पर ताला लगाया गया, वहीं पर यूपी में अखिलेश सरकार ने वर्ग विशेष को ही अधिक पुरस्कृत कर अपनी सरकार का एजेंडा क्लीयर किया है। यही वजह है कि दूरदर्शन के कर्मचारी समेत यूपी के करीब चार पत्रकारों को यश भारती दिया गया। इन पुरस्कारों से दलितों-पिछड़ों को दूर रखा गया है। उनकी लिस्ट भी इस अंक में दी जा रही है, जो यश भारती के कतार में उनके आगे थे, जिन्हें पुरस्कार दिया गया है। शायद इस हकीकत की वजह से ही शरद यादव और बाबा रामदेव ने इन पुरस्कारों के बारे में कड़वी टिप्पणी की थी, जिसे लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया था। इन सभी मुद्दों को समझाने की कोशिश फर्क इंडिया के इस अंक में की गई है।

भारत रत्न का हाल कम बेहाल नहीं है। यहां सचिन तेंदुलकर को पुरस्कार दे दिया जाता है, लेकिन हॉकी के जादूगर ध्यान चंद को लोग भूल जाते हैं। मदन मोहन मालवीय को पुरस्कार दिया जाता है, लेकिन कांशीराम को लेकर बात तक नहीं होती है। पुरस्कार को लेकर स्थिति बनती नहीं, बल्कि काफी हद तक बिगड़ती जा रही है। वह दिन दूर नहीं जब पुरस्कारों का महत्व ही खत्म हो जाए और लोग इससे पीछा छोड़ाते हुए नजर आएं।

मीडिया के तौर पर देश के उस यादव घराने की चर्चा की गई है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। यहां भाई बहन हर कोई पत्रकार है। पंजाब में डेंजर चमार गाने को लेकर चर्चा में आई गिन्नी माही को भी सामने लाने की कोशिश की गई है। गिन्नी अंबेडकर पर खुलकर मंच से गाने वाली सबसे कम उम्र की गायिक हैं। न्यायपालिका में दलितों-पिछड़ों की भागीदारी और आरक्षण को लेकर भी चर्चा की गई है। साथ ही यह भी समझाने की कोशिश की गई है कि हायर जुडिशियरी में आरक्षण क्यों नहीं हो सकता है। आरक्षण की 50 फीसदी की सीमा को बढ़ाए जाने को लेकर पूर्व जस्टिस पीबी सावंत का विचार भी प्रकाशित किया गया है। साथ ही बिहार में न्यायिक सेवा में ओबीसी के आरक्षण को खत्म किए जाने की बात भी उठाई गई है।

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बनारस में एम्स बनाए जाने का मुद्दा जोर पकड़ने लगा है। बीएचयू के डाक्टर ओंम शंकर भी अब यहां एम्स बनाए जाने की मुहिम की अहम कड़ी के रूप में दिखाई पड़ रहे हैं। उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है। जनता की लड़ाई लड़ रहे ओंम शंकर आंदोलन चलाकर आम आदमी की आवाज को बुलंद कर कर रहे हैं और कांशी में एम्स की मांग कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण की मांग भी जोर पकड़ने लगी है। लखनऊ में आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति ने 11 नवंबर को रैली निकालकर केंद्र और राज्य सरकार से आरक्षण बहाल करने की मांग की है। दलित वर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने खुलकर पिछड़े वर्ग के लिए अब पदोन्नति में आरक्षण की मांग करने लगे हैं। सरदार वल्लभ भाई पटेल की 141वीं जयंती पर इसकी गूंज भी राजधानी लखनऊ में सुनाई दी। पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की पुण्यतिथि के अवसर पर आजमगढ़ के पूर्व सांसद रमाकांत यादव ने कहा है कि पिछड़ों को 54 फीसदी आरक्षण की लड़ाई लड़नी होगी। वहीं दूसरी ओर यूपी के सिद्धार्थ नगर में पत्रकार ध्रुव यादव को इस लिए फर्जी मामले में जेल भेज दिया गया, क्योंकि वह सीमा पर से हो रहे अवैध कारोबार की रिपोर्टिंग कर रहा था। स्थानीय निवासी और पत्रकार मामले को लेकर इंसाफ की मांग कर रहे हैं, लेकिन आजाद देश में हर कोई गुलामों की तरह एक दूसरे का मुंह देख रहा है। छात्र भी रैलियां निकाल कर ध्रुव यादव के मामले की सही जांच करवाए जाने की मांग करने में जुटे हैं। इन मुद्दों पर आपकी नजर और नजरिया दोनों ही अहम है। सरकारें यदि इससे मुंह मोड़ लेंगी तो अराजकता बढ़ेगी ही।

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