साहब… इन गायों को कहां भेजा जाए ! कोई गो रक्षक बताएगा

ज्यादातर घरों में पहली रोटी गाय के लिए बनाई जाती है। पूजा पाठ से लेकर अन्य कर्मकांड पर भी गाय का महत्व बना रहता है। सदियों की यह परम्परा है। पर उत्तर भारत के आगे बढ़ने पर हालात बदल जाते हैं। पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण तक। पूर्वोत्तर वालों के आहार में गाय शामिल हो गई, तो गोवा जैसे राज्य में भी इसकी मुख्य वजह इन जगहों पर अंग्रेजों पुर्तगालियों यानी ईसाई धर्म का असर माना जाता है। पर हिंदू बहुल इलाकों में यह नहीं हुआ। मुस्लिम बहुल इलाकों में भी गोकशी की कोई परम्परा नहीं रही। यह ईसाई परम्परा से आई। पर संघ के लोग जब अपने तथाकथित पुनर्जागरण में जुटे, तो उनके निशाने पर मुसलमान थे। आज भी वे निशाने पर हैं।

गाय के इस खेल में फंसाने की कोशिश मुसलमान को है, ईसाई को नहीं। वर्ना इनके पूर्वोत्तर वाले मंत्री तो सीना ठोक कर इसे खाने की बात करते हैं। न ही गोवा वाले भाजपाई कभी निशाने पर रहते हैं। आप तिरुअनंतपुरम के सरकारी अतिथि गृह/होटल में रुकें तो वहां मीनू में बीफ है, पर वह भैस का मांस होता है। भैंस का इस्तेमाल बहुत से लोग करते हैं। लखनऊ से लेकर मुरादाबाद तक बड़े का कबाब/बोटी खूब प्रचलित है। एक वजह सस्ता होना तथा दूसरी वजह पाक कला से जुड़ी है। कबाब इसी का बेहतर माना जाता है। उत्तर भारत में भैंस के मांस को लेकर भी बहुत भ्रम फैलाया जाता है और कई बार निर्दोष लोगों को फंसा भी दिया जाता है। आमतौर पर गोकशी का ज्यादा प्रचलन पूर्वोत्तर या फिर गोवा जैसे राज्यों में ही है। पर राजनीति उत्तर भारत में होती है। और मुस्लिम निशाने पर रहते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम गाय पालते हैं। कभी काटते नहीं, पर बाहर के मुल्कों में इसका जमकर इस्तेमाल होता है।

मध्य वर्ग के ज्यादातर परिवार के सदस्य जो विदेशों में बस गए या नौकरी/पढ़ाई के लिए गए हैं, वे उन सभी रेस्तरां में जाते हैं और खा पीकर आ जातें हैं जहां बीफ परोसा जाता है। मैंने कभी नहीं सुना कि कोई वहां किसी तरह का विरोध करता हो। जब हम लोग पूर्वोत्तर/गोवा में विरोध नहीं करते, तो विदेश में क्या करेंगे। अलग-अलग अंचल में खानपान अलग होता है। चीन/वियतनाम से लेकर यूरोप तक गाय को लेकर अपनी परम्परा अलग है उनकी अलग, पर गाय जब दूध देना बंद कर देती है, तो लोग उसे घर से बाहर कर देते हैं। कोई गो रक्षक उन्हें पालने सामने नहीं आता। यह विचित्र स्थिति है। इन गायों को लेकर हिंदू समाज में कोई बहस भी नहीं है। क्या करेंगे इन गायों का जो दूध नहीं देतीं। हिंदू समाज विधवा औरतों को बनारस/मथुरा भेज देता था। पर इन गायों को कहां भेजा जाए, कोई गो रक्षक बताएगा।

साभार- अंबरीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार. एफबी पोस्ट।

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