कांशीराम को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे अटल, जानिए इस लालच को उन्होंने कैसे ठुकराया

KANSIRAM

फर्क इंडिया डिजिटल डेस्कः कांशीराम की 12वीं पुण्यतिथि पर विशेष.

लखनऊ/इलाहाबाद. भारत में कांशीराम जैसा राजनेता नहीं हुआ। कांशीराम ऐसा नेता थे, जो सिर्फ दलितों-पिछड़ों के लिए जीते थे। वह दलितों-पिछड़ों के लिए मरे भी। दिलचस्प बात ये है कि एक बार उन्हें भारत का राष्ट्रपति बनाने की भी पेशकश की गई, लेकिन उन्होंने उसे ये कहते हुए इनकार कर दिया कि वो भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, राष्ट्रपति नहीं।

बद्री नारायण बताते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी ने उनसे एक बार राष्ट्रपति बनने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने कहा कि वो प्रधानमंत्री बनना पसंद करेंगे। राष्ट्रपति बना कर आप उन्हें चुपचाप अलग बैठा दीजिए, वो ये मानने के लिए तैयार नहीं थे। वो सत्ता का डिस्ट्रीब्यूशन चाहते थे। वो पंजाबी के गुरुकिल्ली शब्द का इस्तेमाल करते थे, जिसका अर्थ था सत्ता की कुंजी। उनका मानना था कि ताकत पाने के लिए स्टेट पर कब्ज़ा ज़रूरी है। कांग्रेस के साथ जुड़े दलित नेताओं को वो चमचा नेता कहते थे, जिनको अगर पांच सीट भी दे दी जाए तो वो ख़ुश हो जाते थे।”

बहुजन समाज आंदोलन को उस समय बहुत बड़ा झटका लगा जब 2003 आते आते कांशीराम गंभीर रूप से बीमार हो गए। उस समय उनकी शिष्या मायावती ने उनका बहुत ख़्याल रखा हालांकि इस पर बहुत विवाद भी हुआ जब उन्होंने कांशीराम के परिवार वालों को उनसे मिलने नहीं दिया।

बद्रीनारायण बताते हैं, “उनका अंत अच्छा नहीं हुआ। एक बार जब वो ट्रेन से जा रहे थे तभी उनको ब्रेन हैमरेज हो गया। जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो उन्हें स्मृतिलोप हो चुका था। वो लोगों को पहचानते नहीं थे। फिर मायावती उन्हें अपने घर ले गईं। कांशीराम के भाइयों ने इसका विरोध किया और वो एक बड़ी लड़ाई में फंस गए। मायावती उन्हें अपने यहां रखना चाहती थीं और उनके परिवार वाले उन्हें अपने यहां ले जाना चाहते थे।”

“मायावती उनका बहुत ध्यान रखती थीं, उनकी दाढ़ी बनाने से लेकर उन्हें नहलाने और उनके बाल झाड़ने तक काम मायावती खुद करती थीं, उसी तरह जैसे कोई अपने पिता की सेवा करता है। उस समय तक काशीराम के पास उन्हें कुछ भी देने के लिए नहीं था। उन्होंने जो कुछ भी उनके साथ किया, निजी आत्मीयता के तहत किया। लोग उसमें मिर्च मसाले देखते हैं। लेकिन ये सभी मानेंगे कि इस संबंध का भाव पक्ष बहुत सबल था।”

सामाजिक क्षेत्र में कांशीराम दलितों के लिए भले ही कुछ न कर पाए हों, लेकिन ये उनकी राजनीतिक इंजीनियरिंग का ही फल था कि दलितों ने पहली बार अकले ही सत्ता का स्वाद चखा, लेकिन कांशीराम ने जीवनपर्यंत कोई राजनीतिक पद नहीं स्वीकार किया।

फोटोः फाइल।

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