अवसरों और संसाधनों पर पहला हक़ मूलनिवासी वंचित वर्गों का !

भारत वर्ष आरक्षण का देश है। अगर महान समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स के अनुसार अगर अबतक विद्यमान समाजो का लिखित इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है तो भारत में वह आरक्षण पर केन्द्रित संघर्ष का इतिहास है। इसलिए यहां शक्ति के स्रोतों पर काबिज विशेषाधिकारयुक्त सुविधासंपन्न तबकों और वंचित बहुजनों के मध्य समय-समय पर आरक्षण पर संघर्ष संगठित होते रहता है ,जिसमें में 7 से 22 जनवरी,2019 के मध्य कुछ नए अध्याय जुड़ गए। 7 जनवरी को मोदी सरकार ने नाटकीय रूप से गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया जिसे अगले दो दिनों में संविधान में आवश्यक संशोधन करते हुए उस विधेयक को संसद में पारित भी करा लिया। त्वरित गति से पास हुए सवर्ण आरक्षण के विस्मय से राष्ट्र उबर भी नहीं था कि 22 जनवरी को विभागवार आरक्षण पर मोहर लग गयी। अब आरक्षित वर्ग इस आरक्षण को लेकर सड़को से लेकर संसद तक आंदोलित है।आन्दोलन के दबाव में केंद्र सरकार द्वारा यह आश्वासन दिए जाने के बावजूद कि रिव्यू पिटीशन ख़ारिज होने पर सरकार अध्यादेश लाएगी, आन्दोलनकारी 13 पॉइंट रोस्टर के खात्मे और 200 पॉइंट रोस्टर लागू करवाने के लिए आर-पार की लड़ाई लगे हुए।

एक नया विचार:रिवर्स 13 पॉइंट रोस्टर !

बहरहाल वंचित आरक्षित वर्गों के छात्र और गुरुजन 13 पॉइंट रोस्टर की जगह पहले वाला 200 पॉइंट रोस्टर लागू करवाने की जो लड़ाई लड़ रहे हैं,उसमें अब एक नया आयाम जुड़ने लगा हैं। वंचित वर्गों के ही कुछ नेता और बुद्धिजीवी यह मांग उठाने लगे हैं कि 200 पॉइंट लागू करवाने की लड़ाई लड़ने के बजाय 13 पॉइंट रोस्टर को ही सशर्त मान लिया जाय। उनकी शर्त यह है कि रोस्टर 13 पॉइंट वाला ही रहे, किन्तु इसे रिवर्स अर्थात उल्टा कर दिया जाय। अर्थात जो भी भर्ती निकले उसमें 1-3 तक क्रमशः एसटी, एससी और ओबीसी को अवसर मिले। चौथे नंबर से सामान्य वर्ग की भर्ती हो। कुख्यात 13 पॉइंट रोस्टर को रिवर्स करने करने की पहलकदमी वर्रिष्ठ पत्रकार व अंतर्राष्ट्रीयख्याति प्राप्त कई किताबों के अनुवादक Mahendra Yadav ने फेसबुक के जरिये की है,जिसे बड़ी तेजी से व्यापक समर्थन मिलता नजर आ रहा है। उन्होंने 7 फरवरी को अपने टाइम लाइन पर यह पोस्ट डाला-‘आंदोलन तो ठीक है, लेकिन अपनी मांग भी स्पष्ट होनी चाहिए। 200 पॉइंट रोस्टर भी किस काम का था! अगर काम का होता तो कुछ तो फायदा दिखता। अब तो रिवर्स 13 पॉइंट रोस्टर ही चाहिए, जिसमें पहले एसटी, फिर एससी और ओबीसी, उसके बाद जनरल का नंबर आए।फालतू के 200 पॉइंट रोस्टर की कोई जरूरत नही।’
रिवर्स रोस्टर के विचार को मिला व्यापक समर्थन
उनके उस पोस्ट को 208 लोगों ने लाइक और 7 लोगों ने शेयर किया था, जबकि 22 लोगों ने कमेंट्स दिया। भारी आश्चर्य की बात थी कि 22 में से सिर्फ 3 लोगों ने ही कुछ उदासीनता दिखाई थी, हालाँकि उन्होंने महेंद्र यादव जी के विचार को ख़ारिज भी नहीं किया था। इनमें चर्चित राजनीति विज्ञानी Arvind kumaar का कमेन्ट था-‘फिलहाल तो 200 पॉइंट रोस्टर ही बच जाये, वही बहुत है। विश्वविद्यालयों ने 200 पॉइंट रोस्टर भी लागू नहीं किया था, इसलिए इसका कोई फायदा भी नहीं दिखा’। अरविन्द कुमार की ही बात का कुछ-कुछ समर्थन करते हुए dharmveer yadaw ने कहा था-‘आपकी बात सही है, लेकिन फिलहाल 200 पॉइंट ही बच जाय, यही बहुत है’। उनकी बात का जवाब देते हुए महेंद्र यादव ने कहा था,’पहले से कमतर मांग करेंगे तो क्या मिलेगा ! जब आन्दोलन ही कर रहे हैं तो सही मांग उठाना चाहिए।’अरविन्द कुमार और धर्मवीर यादव की तरह थोड़ा सा अलग कमेन्ट वरिष्ठ पत्रकार upendra Prasad का था।’रोस्टर सिस्टम ख़त्म हो। सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के लिए इंडियन एजुकेशन सिस्टम बने और इस सर्विस के लिए upsc सेलेक्शन करे ।स्टेट लेवल पर यही काम स्टेट पीसीएस करे’,कहना था उपेन्द्र प्रसाद का। उनका जवाब देते हुए महेंद्र यादव ने लिखा था-‘ यही तो ! हमें क्या चाहिए,ये स्पष्ट तो होना चाहिए। आन्दोलन का मकसद क्या है।। 200 पॉइंट रोस्टर तो लग ही नहीं पाया।’ बहरहाल अरविन्द कुमार, धर्मवीर यादव और उपेन्द्र प्रसाद को छोड़कर बाकी लोगों खुलकर महेंद्र यादव के विचार का समर्थन किया था।एडवोकेट lalbabu lalit ने कहा था-that is what i wanted to say। 200 point roster system is faulty’। Gantes kumar ने महेंद्र यादव के विचार का सोत्साह समर्थन करते हुए लिखा था-‘सही कहा भाई साहब आपने’। Bhawesh chaudhry का कहना था-‘हाँ जी अब इसके लिए आन्दोलन करना चाहिए। Prabuddh bhartiy ने नए विचार का समर्थन करते हुए कहा था,’ये बढ़िया कहा ।।200 होकर भी 40 यूनिवर्सिटियों में ओबीसी 0 है और एसटी 0।7 इसका भी फायदा नहीं ।।13 ही रखों लेकिन रिवर्स क्रम में’। Anil Raj ने रिवर्स क्रम का समर्थन करते हुए कमेन्ट किया था,’ बिल्कुल सही बात रिवर्स मे 13 पॉइंट रोस्टर ही चलना चाहिए। पहले एसटी फिर एससी फिर ओबीसी और बाद मे जनरल। तब जाके कुछ संतुलन बन पायेगा।‘ amit k.yadav saifai ने बड़े जोश के साथ लिखा था-‘यही बात सदन में सपा से सांसद धर्मेन्द्र भैया ने कही है कि हम 13 पॉइंट रोस्टर के समर्थन में हैं। बस उसे उलट दीजिये। पहला, एससी, दूसरा एसटी, तीसरा ओबीसी और चौथा।।’

इसी तरह से बाकि लोगों ने भी महेंद्र यादव के विचार का समर्थन किया था।शायद रिवर्स रोस्टर के विचार का बढ़ता असर ही कहा जायेगा कि मशहूर पत्रकार Dilp mandal के इस पोस्ट-‘50% आरक्षण है। हर दूसरा पोस्ट एसटी-एससी-ओबीसी को मिलनी चाहिए। अगर सरकारें बेईमान और कमीनी न होतीं, तो ये होता रोस्टर सिस्टम ।लेकिन सरकार बेईमान व कमीनी है। और दलित-पिछड़ों-आदिवासियों की बात करने वाला नेता।।। क्यों जुबान ख़राब करूं’– पर prabuddh bhartiy को यह लिखने में कोई कुंठा नहीं हुई-‘200 वाला कोणसे काम का था?

रिवर्स रोस्टर प्रणाली के चैम्पियन पैरोकार : सांसद धर्मेन्द्र यादव

बहरहाल रिवर्स 13 पॉइंट रोस्टर प्रणाली की पहलकदमी भले ही पत्रकार महेंद्र यादव ने की हो,किन्तु इसे जनप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका सांसद धर्मेन्द्र यादव कि ही है,इसका साक्ष्य इस लेखक को 11 जनवरी की शाम को मिल गए। 11 जनवरी,2019 को वंचित वर्गों के छात्र और गुरुजनों ने दिल्ली के आईटीओ अवस्थित यूजीसी के ऑफिस से मानव संसाधन विकास मंत्रालय तक की जो ‘न्याय यात्रा’ निकाली, उसमें यह लेखक भी शामिल था। इस मार्च के जनपथ पहुचने के बाद जब पुलिस ने जुलुस में शामिल लोगों को मारपीट कर पार्लियामेंट थाने में बंद कर दिया, तब सांसद सावित्री बाई फुले के कुछ अन्तराल बाद आन्दोलनकारियों का हौसला बढ़ाने धर्मेन्द्र यादव भी थाने आये। यहाँ पहुंचकर उन्होंने अपने संबोधन में सरकार की मंशा और विपक्ष की रणनीति पर विस्तार से रौशनी डाली, जिसपर लोगों ने बार-बार तलियां बजायी ।लेकिन सबसे ज्यादा ताली उन्हें उस बात पर मिली जब उन्होंने यह कहा-‘ 13 पॉइंट रोस्टर के समर्थन में हैं। बस उसे उलट दीजिये।पहला, एससी, दूसरा एसटी, तीसरा ओबीसी और चौथा जेनरल को दे दीजिये।’ उनके इस कथन पर जब उनके निकट जाकर मैंने बधाई दिया,उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कर यह बात कही,’ कई बार कहा हूं और आगे भी कहता रहूंगा।’

धर्मेन्द्र यादव की इस सोच से शायद औरों की तरह पत्रकार दिलीप मंडल भी रोमांचित हैं, इसलिए उन्होंने सोत्साह 11 जनवरी की देर रात फेसबुक यह पोस्ट डाला जिस पर कुछेक घंटों मध्य ही सैकड़ों लोगों ने अपने पसंद कि मोहर लगा दी। उनका वह पोस्ट था,’रोस्टर लागू करने का लोहियावादी फॉर्मूला- धर्मेंद्र यादव, सांसद। जहां एक ही सीट है, वह आदिवासी को दो, दूसरी सीट एससी को। तीसरी ओबीसी को। इसके बाद चौथी, पांचवीं और छठी अनरिजर्व करो। ऐसे ही 200 प्वायंट तक ले जाओ, जिसमें 30 एससी, 15 एसटी और 54 ओबीसी को दो। बाकी अनरिजर्व रखो खुले मुकाबले के लिए, अगर रोस्टर इस नियम से लागू हुआ तो जज लोग खुद ही कहेंगे कि नौकरी यूनिवर्सिटी और कॉलेज के हिसाब से दो नहीं तो बेचारे सवर्णों को नौकरी कैसे मिलेगी।’

वास्तव में किसी भी विचार को जन्म देने में बुद्धिजीवियों का योगदान भले ही खास हो,किन्तु उसे जनप्रिय बनाने में नेता ही सक्षम होते है।यही रिवर्स रोस्टर के साथ हो रहा है। तेजस्वी यादव के बाद वर्तमान बहुजन नेताओं में धर्मेन्द्र यादव दूसरे ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं, जो सवर्ण आरक्षण के बाद विभागवार आरक्षण से उपजे निराशाजनक हालात में हर समय वंचितों के बीच पहुंचकर मनोबल बढ़ा रहे हैं।और सोशल मीडिया के सौजन्य से विद्युत् गति से उनका सन्देश लोगो तक जा रहा है,जिस कारण रिवर्स रोस्टर का विचार भी फ़ैल रहा। यही कारण है, 12 जनवरी की दोपहर जब इस लेख को लिख रहा हूँ,फेसबुक पर इससे जुड़े दो और पोस्ट बरबस दृष्टि आकर्षित कर रहे हैं। सावित्री बाई फुले महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष NIRDESH SINGH ने आज 12 जनवरी की सुबह 10 बजे यह पोस्ट डाला –‘सरकारें चाहती है कि गरीब और वंचित को उसका हक मिले तो ठीक है 13 पॉइंट रोस्टर लागू कर दो, लेकिन इसको उल्टा करो। पहले ST को दो , दूसरा SC को दो, उसके बाद OBC को, फिर जनरल को ।हम इसका समर्थन करेंगे तब न्यायपूर्ण बंटवारा होगा और गरीब को उसका हक मिलेगा,। देश में सबसे ज्यादा सताया और हक वंचित समाज ST है। सबसे पहले उसको दो जिससे वह देश की मुख्यधारा में जुड़ सके और देश तरक्की की राह पर अग्रसर हो।’लेकिन इस मामले में अबतक का सबसे जोरदार पोस्ट KAPILESH PRASAD की ओर से आया है। उन्होंने आज 12 जनवरी की दोपहर में लिखा है। •
SC/ST/OBC वर्ग के संवैधानिक आरक्षण के प्रावधानों को लेकर देश भर के अनुसूचित जाति /जनजाति और पिछड़े वर्ग के लो आक्रोश और आन्दोलित हैं। संघ भाजपा की संविधान और आरक्षण विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ संसद से लेकर सड़कों तक गतिरोध और बग़ावत के स्वर फुट रहे हैं। 5 मार्च को 13 प्वाइंट रोस्टर रिजर्वेशन प्रणाली आने के बाद से ही देश का सामाजिक और राजनीतिक तापमान उत्तरोत्तर भीषण वृद्धि को अग्रसर है। आरक्षण व्यवस्था और इसकी पूरी प्रणाली को खत्म करने और इसकी हत्या करने की साज़िश के ख़िलाफ़ सबसे पहले यूनिवर्सिटी स्तरीय शिक्षकों, छात्रों, शोधार्थियों सहिंत सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पहल की। रोस्टर को लेकर इनका आन्दोलन धारदार बना और देशव्यापी जन समर्थन के साथ-साथ देश कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं ने इसको अपने नैतिक रूप से भौतिक धरातल पर पुरजोर समर्थन दिया और आज भी ये निरन्तर इस मनुवादी षडयंत्र के ख़िलाफ़ आन्दोलित हैं। 200 प्वाइंट रोस्टर पर संसद में बिल नहीं लाए जाने तक तथा यूनिवर्सिटीज में अगली किसी भी प्रकार नियुक्तियों पर देश की सड़कों और संसद में यह गतिरोध बना रहेगा। संवैधानिक आरक्षण को लेकर इस देशव्यापी आन्दोलन की पृष्ठभूमि मे 13 पॉइंट रोस्टर सिस्टम में देश में शक्ति के तमाम स्रोतों और संसाधनों में बहुजनों की भागीदारी का मुद्दा गरमाया रहेगा।इसमें कोई शक-संदेह नहीं कि SC/ST/OBC की इस राष्ट्रीय अस्मिता की लड़ाई का अगुआ दस्ता शिक्षकों, छात्रों, शोधार्थियों और सामाजिक /राजनीति कार्यकर्ताओं की टीम ने राजनीतिक महकमे के शीर्ष राजनेताओं, सांसदों, विधायकों एव अन्य जन प्रतिनिधियों को विरोध की कतार में ला खड़ा किया है। बहरहाल सरकार इस ज्वलंत मुद्दे को लेकर फंसी जरूर है पर वह अपनी सुनियोजित साज़िशों से बाज नहीं आने वाली! सो बेहतर हो विरोध का यह स्वर और आन्दोलन और मुखर हो, धारदार हो और देश की 85 % बहुसंख्यकों की प्रतिभागिता इसमें बनी रहे।

किन्तु देश की प्रबुद्ध ताक़तों, सामाजिक न्याय की नेतृत्वकारी शक्तियों और वंचित जमात के सच्चे, समर्पित सिपहसालारों व रहनुमाओं को 200 प्वाइंट रोस्टर को पुनः यथावत बहाल करने सम्बन्धी बिल की हठधर्मिता से आगे निकल कर संघ – भाजपा और मोदी सरकार को उनके ही जाल में क्यों न फांसा जाए? इससे देश की समस्त सेवाओं, शक्ति के तमाम स्रोतों, न्यायपालिका आदि में बहुजनों की भागीदारी ” जनसंख्यानुपातिक भागीदारी ” की लड़ाई को संबल और आधार मिले? कहने का आशय यह कि आरक्षण के असल हकदार और देश के वंचितों के साथ संवैधानिक न्याय हो, सो 13 प्वाइंट भी मंजूर है बशर्ते 13 पॉइंट रोस्टर रिजर्वेशन सिस्टम के वर्तमान क्रमानुसार नियुक्तियों के प्रावधानों को सरकार ठीक उल्टे क्रम में संवैधानिक रूप से लागू करने की तत्काल घोषणा करे।

संसाधनों पर पहला हक़ किसका !

बहरहाल वंचित समाजों के बुद्धिजीवियों और नेतृत्व वर्ग के मध्य बड़ी तेजी से उभरता रिवर्स 13 पॉइंट रोस्टर का विचार, बारह साल पुराने एक सवाल को बदले हालात में नए सिरे से और बड़े आकार में राष्ट्र के समक्ष खड़ा दिया है। स्मरण रहे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कभी यह कहकर राष्ट्र को चौका दिया था कि संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है। वह बयान उन्होंने मुस्लिम समुदाय की बदहाली को उजागर करने वाली सच्चर रिपोर्ट के 30 नवम्बर, 2006 को संसद के पटल पर रखे जाने के कुछ ही दिन बाद 10 दिसंबर, 2006 को राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की बैठक में दिया था। एनडीसी की उस बैठक में उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्गों और विशेषकर मुसलमानों का है। डॉ। सिंह के उस बयान का कांग्रेस ने भी समर्थन किया था। उनका वह बयान उस वक्त आया था, जब कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित थे। लिहाजा उनके उस बयान ने काफी तूल पकड़ लिया। भाजपा ने पूर्व प्रधानमंत्री के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उसके बाद एनडीसी का मंच राजनीति का अखाड़ा बन गया था और उसी मंच से भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री के बयान का कड़ा विरोध जताया था।विरोध इतना बढ़ गया था कि बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवक्ता संजय बारू को मनमोहन सिंह के बयान पर सफाई देनी पड़ गयी थी। उन्हें कहना पड़ा था कि प्रधानमंत्री अल्पसंख्यकों की बात कर रहे थे, केवल मुसलमानों की नहीं। तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह ने मनमोहन सिंह के बयान को देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया था।

नरेन्द्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान और रमण सिंह की कड़ी आपत्ति के कुछ अंतराल बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता और लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान पर निशाना साधते हुए कहा था कि केंद्र सरकार अपने स्वार्थों के लिए सरकारी खजाने पर अल्पसंख्यकों का हक़ बताकर अलगाववाद और अल्पसंख्यकवाद को हवा दे रही है। लोग सोच सकते हैं बात आई गयी हो गयी होगी। किन्तु नहीं ! 2006 मे पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा कही गयी उस बात को भाजपा के लोग आज भी नहीं भूले हैं: वे मौका माहौल देखकर समय-समय पर कांग्रेस और डॉ. सिंह को निशाने पर लेते रहे हैं। इसी क्रम में अभी 30 जनवरी को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के राष्ट्रीय सम्मलेन में कह दिया,’जो लोग दावा करते थे कि संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों का है, उन्होंने उनके हक़ के लिए कुछ नहीं किया। जबकि हमारा मानना है देश के संसाधनों पर पहला हक़ गरीबों का है।’अमित शाह के दो दिन बाद 1 फ़रवरी, 2019 को बजट पेश करते हुए केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने फिर एक बार मनमोहन सिंह पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते एवं भाजपा के रुख से अवगत कराते हुए कह दिया,’संसाधनों पर पहला हक़ गरीबों का है।’ यही नहीं पुराने दलित भाजपाई रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति बनने के बाद भी मनमोहन सिंह कि बात नहीं भूले ,लिहाजा 70 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या राष्ट्र के नाम राष्ट्रपति के पारम्परिक संबोधन में उन्होंने 25 जनववरी,2019 की शाम कह दिया,’देश के संसाधनों पर हम सभी का बराबर का अधिकार है।चाहे हम किसी भी समूह, समुदाय या क्षेत्र के हों।समग्रता की भावना को अपनाये बगैर भारत के विकास कि अवधारणा साकार नहीं हो सकती। भारत की बहुलता हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। भारतीय मॉडल विविधता, लोकतंत्र और विकास के तीन स्तंभों पर टिका है।’

अवसरों और संसाधनों पर पहला हक़ : सवर्णों या एसटी-एससी-ओबीसी का!

बहरहाल अब रिवर्स 13 पॉइंट रोस्टर के जरिये एसटी,एससी ,ओबीसी के बाद सामान्य वर्ग को देने का जो सवाल बहुजन नेतृत्व और बुद्धिजीवियों की ओर से खड़ा किया जा रहा है , वह यक्ष प्रश्न बनकर अब राष्ट्र के समक्ष खड़ा होने जा रहा है। स्मरण रहे ढेरों जानकार लोगों के मुताबिक़ जो 13 पॉइंट रोस्टर उच्च शिक्षा में नियुक्तियों का आधार बनने जा रहा है , वह कल उच्च शिक्षा के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी लागू हो सकता है। अतः इसका असर कॉलेज/विश्वविद्यालयों से आगे भी होने जा रहा है। बहरहाल यह बात ढंकी-छिपी नहीं रह गयी है कि इसका पूरा ताना– बाना उन बहुजनों को नॉलेज सेक्टर आउट करने के मकसद से तैयार किया गया है, जिनका राज-सत्ता और अर्थ-सत्ता के साथ ज्ञान-सत्ता में अभी ठीक से प्रवेश भी नहीं हो पाया है। दूसरी ओर इसके जरिये ऐसे तबकों का ज्ञान-सत्ता में अप्रतिरोध्य एकाधिकार स्थापित करने का सफल उपक्रम चलाया गया है, जिनके शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक और शैक्षिक) पर वर्चस्व की दुनिया में कोई मिसाल ही नहीं है। इन्ही सवर्णों को संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण सुलभ कराने के एक पखवाड़े के मध्य 13 पॉइंट रोस्टर के जरिये शिक्षा के क्षेत्र में उनके एकाधिकार को पुष्ट कराने की व्यवस्था करा दी गयी है।बहरहाल 13 पॉइंट रोस्टर के लाभकारी वर्ग की स्थिति का एक बार ठीक से जायजा लेने पर किसी का भी सर चकरा जायेगा।

केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1 जनवरी 2016 को जारी आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार में ग्रुप ‘ए’ की कुल नौकिरयों की संख्या 84 हजार 521 है। इसमें 57 हजार 202 पर सामान्य वर्गों ( सवर्णों ) का कब्जा है। यह कुल नौकरियों का 67.66 प्रतिशत होता है। इसका अर्थ है कि 15-16 प्रतिशत सवर्णों ने करीब 68 प्रतिशत ग्रुप ए के पदों पर कब्जा कर रखा है और देश की आबादी को 85 प्रतिशत ओबीसी, दलित और आदिवासियों के हि्स्से सिर्फ 32 प्रतिशत पद हैं। अब गुप ‘बी’ के पदों को लेते हैं। इस ग्रुप में 2 लाख 90 हजार 598 पद हैं। इसमें से 1 लाख 80 हजार 130 पदों पर अनारक्षित वर्गों का कब्जा है। यह ग्रुप बी की कुल नौकरियों का 61।98 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि ग्रुप बी के पदों पर भी सर्वण जातियों का ही कब्जा है। यहां भी 85 प्रतिशत आरक्षित संवर्ग के लोगों को सिर्फ 28 प्रतिशत की ही हिस्सेदारी है। कुछ ज्यादा बेहतर स्थिति ग्रुप ‘सी’ में भी नहीं है। ग्रुप सी के 28 लाख 33 हजार 696 पदों में से 14 लाख 55 हजार 389 पदों पर अनारक्षित वर्गों ( अधिकांश सवर्ण )का ही कब्जा है। यानी 51।36 प्रतिशत पदों पर। आधे से अधिक है।हां, सफाई कर्मचारियों का एक ऐसा संवर्ग है, जिसमें एससी,एसटी और ओबीसी 50 प्रतिशत से अधिक है। जहां तक उच्च शिक्षा में नौकरियों का प्रश्न है इन पंक्तियों के लिखे जाने के एक सप्ताह पूर्व आरटीआई के सूत्रों से पता चला कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसर, एसोसिएट और असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पदों पर सवर्णों की उपस्थित क्रमशः 95।2 , 92।90 और 76।12 प्रतिशत है। आंबेडकर के हिसाब से शक्ति के स्रोत के रूप में जो धर्म आर्थिक शक्ति के समतुल्य है, उस पर आज भी 100 प्रतिशत आरक्षण इसी वर्ग के लीडर समुदाय का है। धार्मिक आरक्षण सहित सरकारी नौकरियों के ये आंकडे चीख-चीख कह रहे हैं कि आजादी के 70 सालों बाद भी हजारों साल पूर्व की भांति सवर्ण ही इस देश के मालिक हैं।
सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्ही मालिकों के हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकाने इन्ही की है। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाडियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्ही के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है। संसद विधान सभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्ही का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्ही वर्गों से हैं। न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं भी किसी समुदाय विशेष का नहीं है।अतः भारत के जिस तबके की प्रगति में न तो अतीत में कोई अवरोध खड़ा किया गया और न आज किया जा रहा है ; जिनका आज भी शक्ति के समस्त स्रोतों पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा है,वैसे शक्तिसंपन्न सवर्णों को 13 रोस्टर के जरिये कॉलेज/विश्वविद्यालय की नौकरियों या अन्य किसी भी क्षेत्र में पहले अवसर सुलभ कराने का कोई औचित्य है ! नहीं है!नहीं है नहीं है!!!

ऐसे में दुनिया की कोई भी अदालत: कोई भी लोकतान्त्रिक व विवेकसंपन्न समाज रिवर्स 13 पॉइंट रोस्टर का समर्थन करेगा ही करेगा। कम से कम बहुजन समाज तो करने लगा है। काबिले गौर है कि रिवर्स 13 पॉइंट रोस्टर के समर्थन में आ रहे पोस्टों की देखादेखी कल अर्थात 12 जनवरी की शाम एक छोटा सा यह पोस्ट डाला-अवसरों और संसाधनों पर पहला हक़ वंचित (एसटी-एससी-ओबीसी) वगों का ।इससे आप कितना सहमत हैं?’मेरे इस छोटे से पोस्ट पर आज 13 जनवरी की सुबह 10।40 तक 55 कमेन्ट आये हैं, और 90 प्रतिशत ज्यादा लोगों ने 100 प्रतिशत समर्थन जताया है,जो बताता है यदि बहुजन नेतृत्व और बुद्धिजीवी वर्ग अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में पहला हक़ किनका के मुद्दे पर पर दुनिया कि विशालतम वंचित आबादी के मध्य जाये तो उसके चमत्कारिक परिणाम सामने आ सकते हैं। हाँ जैसे मनमोहन सिंह के बयान को सुविधाभोगी सवर्ण वर्ग के नेता और बुद्धिजीवियों ने अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला करार दिया था वैसे ही वे वंचित जातियों के हक़ की हिमायत को जातिवाद को बढ़ावा देने वाला कह सकते हैं।लेकिन उनके ऐसे आरोपों की परवाह न करते हुए बहुजनों को तमाम क्षेत्रों में ही एसटी,एससी और ओबीसी को प्राथमिकता दिए जाने की लड़ाई में उतरना चाहिए। बिना इसके न तो बहुजनों को उनका वाजिब हक़ मिलेगा और न ही सामाजिक और आर्थिक गैर- बराबरी का खात्मा ही होगा, जिसका सपना हमारे राष्ट निर्माताओं ने देखा था।

लेखक -एच.एल दुसाध, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। संपर्क:9654816191

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