2 अप्रैल 2019 : एक नई क्रांति का शंखनाद!

NEW DELHI। 2 अप्रैल, 2018 दलित आंदोलनों के उन चुनिंदा दिवशों में जगह बना चुका है, जो बहुजनों को लम्बे समय तक प्रेरित करता रहेगा। इसी खास दिवस से प्रेरित होकर दलित छात्र-गुरुजन, लेखक और एक्टिविस्ट 2 अप्रैल, 2019 को रामलीला मैदान से एक नयी क्रांति का शंखनाद करने जा रहे हैं। 2 अप्रैल, 2018 के आंदोलन में ऐसी क्या खास बात जिससे प्रेरणा लेकर बहुजन बुद्धिजीवी क्रांति का एक नया शंखनाद करने जा रहे हैं? इसे जानने के लिए फेसबुक पर बेहद सक्रिय ‘यादव शक्ति पत्रिका’ के कार्यकारी संपादक चन्द्रभूषण सिंह यादव का 3 अप्रैल, 2018 यह पोस्ट बहुत सहायक हो सकता है।

चन्द्रभूषण सिंह यादव ने ‘भारत बंद और दलित चेतना’ शीर्षक डाले गए अपने पोस्ट में लिखा था-‘मैं दलित चेतना और उनके संघर्ष को कोटिशः नमन करता हूं, क्योंकि वे ही कौमें जिंदा कही जाती हैं, जिनका इतिहास संघर्ष का होता है, जो अन्याय के प्रतिकार हेतु स्वचेतना से उठ खड़े होते हैं। 2 अप्रैल 2018 का दिन दलित चेतना का, संघर्ष का, बलिदान का, त्याग का ऐतिहासिक दिन बन गया है क्योंकि बगैर किसी राजनैतिक संगठन या बड़े नेता के आह्वान के सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया पर दलित नौजवानों/बुद्धिजीवियों की अपील पर पूरे देश में दलित समाज का जो स्वस्फूर्त ऐतिहासिक आंदोलन उठ खड़ा हो गया, वह देश के तमाम बड़े आंदोलनों को पीछे छोड़ते हुए एक अद्वितीय और अनूठा आंदोलन हो गया है।

अब तक देश मे जितने बड़े आंदोलन हुए उन सबका नेतृत्व या तो किसी नेम-फेम वाले बड़े व्यक्ति/नेता ने किया या किसी बड़े राजनैतिक/सामाजिक संगठन द्वारा प्रायोजित हुआ, जिसका भरपूर प्रचार– प्रसार विभिन्न माध्यमों से या मीडिया द्वारा किया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट में किये गए अमेंडमेंट के बाद सोशल मीडिया पर एक न्यूज उछला कि 2 अप्रैल को दलित समाज द्वारा भारत बंद किया जाएगा। इस आह्वान का कर्ता-धर्ता कौन है, यह अपील किसकी है, ये सब कुछ बेमानी हो गया और सोशल मीडिया पर उछले इस अपील की परिणति यह हुई कि 2 अप्रैल को पूरा भारत बिना किसी सक्षम नेतृत्व के बुद्धिजीवियों/छात्रों/नैजवानों और प्रबुद्धजनों के सड़क पर उतर जाने से बंद हो अस्त-व्यस्त हो गया। इस आंदोलन का एक पहलू जहां यह रहा कि पूरे देश के दलित बुद्धजीवी एकजुट हो करो या मरो के नारे के साथ जय भीम का हुंकार भरते हुए देश भर में सड़कों पर आ गये तो कथित प्रभु वर्ग अपने अधिकारों को बचाने हेतु आंदोलित संविधान को मानते हुए शांतिपूर्ण सत्याग्रह कर रहे वंचित समाज के लोगों पर ईंट- पत्थर-गोली चलाते हुए इस आंदोलन को हिंसक बना दिया, जिसमें 14 दलित साथी शहीद हो गए। यह आंदोलन अपने आप मे बहुत ही महत्वपूर्ण आंदोलन हो गया है, क्योंकि अपने संवैधानिक अधिकारों को महफ़ूज बनाये रखने के लिए शहादत देने का ऐसा इतिहास अब तक किसी कौम ने नहीं बनाया है। यह दलित समाज ही है, जो अपने अधिकारों व सम्मान के लिए लड़ना व मरना जानता है।

वास्तव में 2 अप्रैल का दलितों का स्वतःस्फूर्त भारत बंद था ही इतना प्रभावशाली कि यादव शक्ति पत्रिका के संपादक की भांति तमाम समाज परिवर्तनकामी बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट उसकी सराहना करने में एक दूसरे से होड़ लगाये। उस दिन सचमुच देश थम गया था। यूपी-बिहार, राजस्थान-पंजाब-हरियाणा इत्यादि की भांति ही 2 अप्रैल का भारत बंद हर जगह सफल रहा था। तमाम जगहों पर ट्रेनों के चक्के थम गए थे, सड़क यातायात रुक गया था : दुकानें बंद एवं जीवन अस्त व्यस्त हो गया था। इस दौरान यह कई जगहों पर हिंसात्मक रूप अख्तियार कर लिया था । विरोध प्रदर्शन के दौरान बिहार में भारी बवाल हुआ था। पटना समेत प्रमुख शहरों और जिला मुख्यालयों में हालात बेकाबू हो गए थे। स्कूल, कॉलेज, और बाजार बंद रहे। पंजाब सरकार के शांतिपूर्ण बंद की अपील को ताक पर रखते हुए प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की थी। इस दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही। अमृतसर, जालंधर सहित चार जिलों में ट्रेनों को रोका गया था। शिक्षण संस्थान, सरकारी व प्राइवेट बसें पूरी तरह बंद रहीं, मोबाइल इंटरनेट सेवा व एसएमएस सेवा भी बंद रही। हरियाणा के पंचकुला, अम्बाला, कैथल, हिसार, रोहतक, यमुनानगर, फरीदाबाद, गुरुग्राम व चंडीगढ़ में दलितों ने विरोध मार्च निकाले थे।

सड़क व रेल यातायात बाधित किया था। समूचे राजस्थान में जगह-जगह तोड़ – फोड़, आगजनी की घटनाएं सामने आयीं थीं। एससी/एसटी एक्ट में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश में बंद बेहद सफल रहा था। किन्तु कुछ जिलों में आंदोलन हिंसात्मक रूप ले लिया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चार जिलों मेरठ, आगरा, हापुड़, और मुजफ्फरनगर में तो हालात इतने बेकाबू हो गए थे कि दोपहर बाद चार कंपनी आरएऍफ़ और भेजनी पड़ी थी । इस दौरान मेरठ में दो और मुजफ्फरनगर में एक की मौत हो गयी थी। किन्तु मौतों के लिहाज से ज्यादे चर्चा में रहा था, मध्य प्रदेश,जहां भारत बंद के दौरान ग्वालियर में दो, भिंड में तीन , मुरैना व डबरा में एक-एक जानें गईं थीं। शाम होते-होते अधिकांश टीवी चैनल ही इस सफलतम बंद के पीछे क्रियाशील कारणों की खोज करने के बजाय बंद के दौरान हुई घटनाओं को प्रमुखता देकर इसकी अहमियत कम करने की कोशिश किये थे।

बहरहाल उस ऐतिहासिक भारत बंद सबसे बेहतरीन निष्कर्ष रमेश मांझी नामक एक व्यक्ति की और से आया था। उन्होंने इस आंदोलन की 27 विशेषताएं बताते हुए निष्कर्ष था -’ 2 अप्रैल, 2018 का भारत बंद एक नया इतिहास बन चुका है।दो अप्रैल भारत बंद क्रांति का इतिहास आने वाले भविष्य में स्कूलों एवं कॉलेजों में पढाया जायेगा एवं इस पर टीवी सीरियल एवं फिल्में भी बनेंगी।इसलिए इससे सम्बंधित फोटो , वीडियो , सीडी, डी वी डी इत्यादी साक्ष्य के रूप में पेश करने के लिए सुरक्षित रखें। क्योंकि इससे आने वाले दिनों में बहुजन आंदोलनकारी प्रेरणा लेकर नए-नए इतिहास रचेंगे।

रमेश मांझी का आंकलन बिलकुल दुरुस्त था। बदले दलित साईक का दुर्लभ साक्ष्य पेश करने वाले उस आंदोलन से बहुजनों ने प्रेरणा लिया भी। 2 अप्रैल को लाखों लोग एससी/एसटी एक्ट को कमजोर किये जाने के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे और परवर्तीकाल में सरकार इसे नए सिरे से प्रभावी बनाने के लिए मजबूर हुई। 2 अप्रैल, 2018 के ऐतिहासिक भारत बंद से यह संदेश गया कि बहुजन समाज यदि अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सड़कों पर उतरे, तो उसे तानाशाही सरकार तक नजअंदाज नहीं कर सकती।

2 अप्रैल के ऐतिहासिक भारत बंद से प्रेरणा लेकर 2019 में 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ बहुजन समाज के छात्र-गुरुजन,लेखक-एक्टिविस्ट फिर सडकों पर उतरे और उनका 5 मार्च ,2019 का भारत बंद इतना इफेक्टिव रहा कि सरकार फिर घुटने टेकने के लिए मजबूर हुई। अब उसी 2 अप्रैल से प्रेरणा लेकर आगामी 2 अप्रैल, 2019 को भारी संख्या में बहुजन छात्र-गुरुजन और लेखक-एक्टिविस्ट उस ऐतिहासिक रामलीला मैदान को जमा होने जा रहे रहे हैं, जो मैदान आजाद भारत की अनेको ऐतिहासिक परिवर्तनों का साक्षी बना है।

2 अप्रैल, 2019 को रामलीला मैदान से सामाजिक और राजनीतिक क्रांति का एक नया शंखनाद होने जा रहा है। उस दिन बहुजन समाज का बौद्धिक समूह लोकसभा चुनाव-2019 के लिए ‘बहुजन मैनिफेस्टो’ जारी कर देश के राजनीतिक दलों के सामने एक नक्शा पेश करेगा कि देश की भावी राजनीति किन मुद्दों पर केंद्रित होगी। यह आजाद भारत की हिस्ट्री का पहला अवसर होगा जब देश के वंचित बहुजन समाज का बौद्धिक तबका राजनीति को जीने-खाने का जरिया बना चुके दिशाहीन नेताओं को रास्ता दिखायेगा कि उसे राजनीति किन समस्यायों के निराकरण के लिए करनी होगी। दूसरे शब्दों में उस दिन राजनीति को दिशा देने की एक नयी मशाल रामलीला मैदान में जलेगी। यदि बहुजन छात्र-गुरुजन ,लेखक-एक्टिविस्ट की प्रत्याशित उपस्थित रामलीला मैदान में हो जाती है तब यह शर्तिया तौर पर तय हो जायेगा कि राजनीति बहुजन बुद्धिजीवियों के हिसाब से चलेगी: गुंडे-माफिया और घर-परिवार समृद्ध करने वाले नेताओं के हिसाब से नहीं।

एचएल दुसाध
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष हैं)

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